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Saturday, January 12, 2013

Media, Part - 5 (Dhai Aakhar Hasya Ke)

लोग कहते हैं,
कि बारह साल बाद तो
घूरे के दिन भी बदलते हैं।
पर आज़ादी के साठ साल बाद भी
क़ानून की दशा नहीं सुधरी,
एक दिन प्रियदर्शनी मट्टू
और जेसिका लाल के हत्यारे
बारी-बारी हो गए बरी।
अंधे क़ानून के संकेत साफ थे
बड़े बाप के बेटों के
सौ खून भी माफ़ थे।

तब मीडिया आया आगे
और बोल-बहुत हो गया अब,
कानून को दिखे न दिखे
मुझे दिखता है सब।
फिर क्या था
रिपोर्टर, बाहुबलियों के
यूं हाथ धोकर के पीछे पड़े,
जैसे शोले फिल्म में
जय और वीरू
गब्बर के पीछे पड़े।
जब तक अदालत ने
एक हत्यारे को फांसी,
और दूसरे को उम्र कैद का
आदेश न दे दिया,
तब तक चैन से नहीं बैठा मीडिया।

फिर तो एक के बाद एक
सुखद जजमेंट आते रहे
जेठमलानी टाइप
वकालत के गाल पर
ऐसा थप्पड़ पड़ा
कि  देर तक सहलाते रहे।
अब तो कोई बेटा
बदमाशी करता है
तो बाहुबली कहता है
बेटा  बहुत पछताएगा
सुधर जा वरना
तेरा बाप मीडिया आ जाएगा।

Media, Part - 4 (Dhai Aakhar Hasya Ke)

रिपोर्टर टी. वी. पर आया
और विधान सभा का
आंखों देखा हाल सुनाया,
आज विधान सभा में जमकर
सदस्यों ने एक दूसरे पर
जूते बरसाए
किसी के हिस्से में आए
किसी के हिस्से में नहीं आए।
जिनके हिस्से में आए
उन्होंने खाए
जिनके हिस्से में नहीं आए
उन्होंने नारे लगाए।
इस बीच किसी का निशाना
दे गया दगा
एक जूता अध्यक्ष महोदय
को जा लगा
मच गई हड़बड़ी
कार्रवाई रोकनी पड़ी।
सरकार ने तत्काल
जांच का आदेश दिया
अध्यक्ष महोदय ने
अभी तक जूता वापस नहीं किया
लखनऊ से मैं, दीपक सौरसिया।

Media, Part - 3 (Dhai Aakhar Hasya Ke)

दूरदर्शन ने
अपने विशेष कार्यक्रम के अंतर्गत,
फ़सल को नुकसान -
पहुंचाने वाले कीड़ों की बाबत
वो दुर्लभ जानकारी दी,
जो किसान भाइयों को
पहले से ही थी।
आह ! दूरदर्शन
तू बिलकुल नहीं बदला
जो देखे, उसका भी भला,
जो नहीं देखे उसका भी भला।

Friday, January 4, 2013

Media, Part - 2 (Dhai Aakhar Hasya Ke)

शहर  के बीच
हाई-वे का सीन था
सीन प्रात:कालीन था
रिपोर्टर मुस्कुराया
और गर्व से बताया
" ये है एशिया का सबसे बड़ा
ओपन एयर शौचालय
और मैं हूँ अजय
आप देख रहे हैं
हमारा विशेष कार्यक्रम
हाई-वे के हम दम
हाथ में लोटा-डिब्बा लिए
लोग आ रहे हैं
जा रहे हैं
और वापस जा रहे हैं
हिन्दू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
वैसे तो हर जगह लड़ाई
हाई-वे पर भाई-भाई।"

इसके बाद रिपोर्टर ने
अपना रुख दूसरी तरफ किया
और एक हाई-वे के
हम दम का इंटरव्यू लिया
" आप यहां क्या कर रहे हैं?"
" जी मैं यहां क्या कर रहा हूं,
ये तो आप देख ही रहे हैं
पर आप यहां क्या कर रहे हैं?"
रिपोर्टर बोला -
" हम लाइव टेलीकास्ट कर रहे हैं
हमारा विशेष कार्यक्रम
हाई-वे के हमदम
इसमें आपका स्वागत है।"
हमदम बोला -
" हम तो यहां रोज आते हैं
आज आपका स्वागत है।
लेकिन ये तो कहो
आज फैशन शो की जगह, हमारा शो?
मजे से फिल्माओ, क्या लोकेशन है
हम धरती पुत्र -
और ये धरती पुत्रों का प्रात:कालीन
खुला अधिवेशन है।

रिपोर्टर ने पूछा -
" क्या आपको नहीं लगता कि आप
सरकारी नियम का उलंघन कर रहे हैं?"
" जी हम तो कुदरत के नियम का
पालन कर रहे हैं"
अब कुदरत के नियम का पालन करने से
सरकारी नियम टूटते हैं
तो हम क्या कर सकते हैं?"

रिपोर्टर ने इंटरव्यू आगे बढ़ाया
" ये हाई-वे कब से है?"
" जी दस साल से।"
" यहां आपका अधिवेशन
कब से चल रहा है?"
" जी महाभारत काल से,
पहले यहां एक गांव था
एक दिन शहर आ पहुंचा टहलता हुआ
और गांव का अपहरण कर लिया
हमने भी आधुनिकता के सामने
समर्पण कर दिया
नतीजा सामने है, देख लिया?
शहर ने हमारा
और हमने शहर का
हुलिया बिगाड़ के रख दिया।"

तभी न्यूज रीडर ने सवाल किया
" अजय ! ख़राब मौसम या बरसात के दिन
बाधा  पहुंचाते हैं
क्या तब भी ये लोग रोज आते हैं?
बोला अजय - " बरसात हो या प्रलय
रोज आना पड़ता है
आदमी खाए बिना रह सकता है
नहाए बिना रह सकता है
लेकिन आये बिना -
एक दिन से अधिक नहीं रह सकता संजय,"
संजय बोला -
" इस जानकारी के लिए
शुक्रिया अजय।"

अंतिम सवाल किया रिपोर्टर ने-
" क्या कारण है कि शहर में
आप न शरमाते हैं, न लजाते हैं
इस तरह खुले में बैठ जाते हैं
जबकि गांव में-आज भी
लोक लाज निभाते हैं?"
हम दम बोला-
"गांव में एक दुसरे को जानते हैं
इसलिए करते हैं लाज
यहां जान पहचान ही नहीं
तो काहे की लाज
और किसका लिहाज़
गांव में संस्कार था
शहर में रोजगार था
रोजगार के लिए गांव छूटा
तो आंखों की शर्म रही जाती,
वहां पगड़ी उतारने में
आती थी शर्म
यहां कपड़े  उतारने में नहीं आती।"

Tuesday, August 28, 2012

Media, Part - 1 (Dhai Aakhar Hasya Ke)

खबर थी
एक बीमार नेता ने, लंदन में
अंतिम सांस ली।
उधर यमदूत नेता को लेकर
नरक पहुंचे भी नहीं
उससे पहले-चैनल का रिपोर्टर
लंदन पहुंच गया अपनी टीम लेकर
और नेता के बेटे का इंटरव्यू लिया-

" आपको कैसा लग रहा है?"
" जी मैं कुछ समझा नहीं, क्या कैसा लग रहा है?"
" आपके पिताजी के मरने की खबर सुनकर
आपको कैसा लग रहा है?"
" जी बहुत बुरा लग रहा है।"
" अंतिम सांस लेने से पहले
उन्होंने किसी दर्द या तकलीफ की शिकायत की थी।"
" जी नहीं डायरेक्ट अंतिम सांस ली थी"
" इससे पहले भी कभी
उन्होंने अंतिम सांस ली थी?"
" जी कोशिश तो की थी
लेकिन डाँक्टरों ने लेने नहीं दी।"
" अंतिम सांस लेने के बाद क्या हुआ?"
" जी अंतिम सांस लेने के बाद वे मर गए।"
" क्या उनको पता था
कि अंतिम सांस लेने के बाद वे मर जायेंगे?"
" जी पता था।"
" जब उनको पता था
कि अंतिम सांस लेने के बाद
वे मर जायेंगे
तो उन्होंने अंतिम सांस क्यों ली?"
" जी राष्ट्र हित में ली!"
" उन्होंने राष्ट्र हित में अंतिम सांस ली,
ये आप कैसे कह सकते हैं?"
" जी मैं ऐसे कह सकता है
कि उन्होंने जो भी काम किया,
वो या तो राष्ट्र हित में किया
या पार्टी के हित किया
अगर पार्टी के हित में
अंतिम सांस लेते
तो चुनाव से ठीक पहले लेते
सहानुभूति की लहर बनती
दो-चार सीटें ज्यादा मिलती
यानि पार्टी के हित में
अंतिम सांस नहीं ली
इसका ये मतलब हुआ
कि  उन्होंने राष्ट्र हित में
अंतिम सांस ली।"

" वे लंदन क्यों आये थे?"
" जी अंतिम सांस लेने के लिए आये थे"
" वे ये अंतिम सांस
भारत में भी ले सकते थे।
इसके लिए इतना दूर क्यों आये?"
" जी राष्ट्र हित में आये।"

" आपने प्रधानमंत्री का
वो बयाँ पढ़ा है
जिसमें उन्होंने कहा है'
कि  नेताजी के जाने से
राष्ट्र का बड़ा नुकसान हुआ है।"
" जी पढ़ा है।"

" आप कह रहे हैं
कि  उन्होंने राष्ट्र हित में अंतिम सांस ली,
और प्रधानमंत्री कह रहे हैं
कि  उनके जाने से
राष्ट्र का बड़ा नुकसान हुआ है।
अब सवाल ये उठता है
कि  राष्ट्र हित में अंतिम सांस ली
तो राष्ट्र का नुकसान कैसे हुआ?
फ़ायदा होना चाहिए।
फ़ायदा हुआ है
तो कितना हुआ है?
ये प्रधानमंत्री को
बताना चाहिए।
और क्या  इस परंपरा को
आगे बढाया जाना चाहिए?
सरकारी खर्चे पर
डायलेसिस के सहारे जीवित
निकम्मे नेताओं को
राष्ट्र हित में-मरने के लिए
आगे आना चाहिये?"
" बहरहाल -
ये हैं कुछ अनसुलझे सवाल।"
वो आंधी की तरह आया
और तूफ़ान की तरह छा  गया
कुछ सवाल किये
और जवाब लिए बिना ही
ब्रेक पर चला गया।